कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानवीय स्मृति का बदलता स्वरूप: भारतीय युवाओं में याद रखने भूलने और ज्ञान प्राप्त करने की नई सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन
Author(s): Dr. Kartik SinghAbstract
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विस्तार ने मानवीय स्मृति ज्ञान प्राप्ति और दैनिक बौद्धिक व्यवहार की पारंपरिक प्रक्रियाओं को एक नए सामाजिक संदर्भ में ला खड़ा किया है। भारतीय युवा अब अनेक तथ्यों सूचनाओं निर्देशों और विचारों को स्वयं याद रखने के बजाय डिजिटल उपकरणों खोज प्रणालियों सामाजिक माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संवाद प्रणालियों पर निर्भर हो सकते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी परिवर्तन का समाजशास्त्रीय अध्ययन करता है और यह समझने का प्रयास करता है कि तकनीकी सहायता के बढ़ते प्रयोग से याद रखने भूलने जानकारी खोजने और ज्ञान को आत्मसात करने की प्रक्रियाएँ किस प्रकार पुनर्गठित हो रही हैं। अध्ययन गुणात्मक द्वितीयक-स्रोत एवं व्याख्यात्मक पद्धति पर आधारित है तथा स्मृति संज्ञानात्मक विस्तार डिजिटल निर्भरता ज्ञान के समाजशास्त्र और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित साहित्य का विश्लेषण करता है। अध्ययन से संकेत मिलता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय स्मृति को केवल कमजोर नहीं करती बल्कि स्मृति के सामाजिक कार्य को पुनर्परिभाषित करती है। युवा कुछ सूचनाओं को याद रखने के बजाय उन्हें शीघ्रता से पुनः प्राप्त करने की क्षमता को अधिक महत्वपूर्ण मान सकते हैं। इससे ज्ञान के आंतरिक संचयन से बाह्य डिजिटल स्मृति की ओर संक्रमण दिखाई देता है। यह परिवर्तन सुविधा और उत्पादकता बढ़ा सकता है किंतु गहन समझ स्वतंत्र चिंतन और दीर्घकालिक स्मृति के अभ्यास के लिए नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न करता है।