महिला सशक्तिकरण: भ्रम वास्तविकता और चुनौतियाँ
Author(s): डॉ राखी चौहानAbstract
महिला सशक्तिकरण इक्कीसवीं सदी के सामाजिक विमर्श का एक केंद्रीय विषय बन चुका है। सरकारी योजनाओं विधायी सुधारों शैक्षिक विस्तार और मीडिया-प्रचार ने यह धारणा उत्पन्न की है कि भारतीय समाज में स्त्रियाँ अब पूर्णतः सशक्त हो चुकी हैं। किंतु यह प्रस्तुत शोध पत्र इस दावे की आलोचनात्मक समीक्षा करता है और यह प्रश्न उठाता है कि सशक्तिकरण की जो छवि निर्मित की गई है वह कितनी वास्तविक है और कितनी भ्रामक। यह अध्ययन तीन स्तरो पर केंद्रित है — प्रथम सशक्तिकरण के इर्द-गिर्द रचे गए भ्रम (यथा प्रतीकात्मक भागीदारी टोकनवाद और उपभोक्तावादी नारीवाद) द्वितीय शिक्षा राजनीतिक आरक्षण आर्थिक भागीदारी और विधिक अधिकारों के क्षेत्र में हुई ठोस वास्तविक प्रगति और तृतीय पितृसत्ता आर्थिक असमानता हिंसा डिजिटल विभाजन तथा क्रियान्वयन की दुर्बलता जैसी सतत चुनौतियाँ। द्वितीयक स्रोतों (सरकारी रिपोर्टें जनगणना आँकड़े NFHS आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण एवं शोध साहित्य) के गुणात्मक विश्लेषण के आधार पर यह पत्र निष्कर्ष निकालता है कि भारत में महिला सशक्तिकरण एक अपूर्ण एवं असमान प्रक्रिया है — जहाँ विधिक और शैक्षिक स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति हुई है वहीं सामाजिक-सांस्कृतिक मानसिकता और आर्थिक स्वायत्तता के धरातल पर गहरे अंतराल विद्यमान हैं। अंततः यह अध्ययन नीतिगत सुझाव प्रस्तुत करता है जिनके माध्यम से कागज़ी सशक्तिकरण को वास्तविक सशक्तिकरण में रूपांतरित किया जा सके।