गाँधी की शिक्षा सम्बन्धी अवधारणा (नई तालीम एवं बुनियादी शिक्षा का एक दार्शनिक एवं शैक्षिक विश्लेषण)
Author(s): डॉ राखी चौहान, प्रोफ. मीना चरांदाAbstract
महात्मा गांधी न केवल एक राजनीतिक नेता एवं समाज सुधारक थे अपितु एक मौलिक शिक्षाशास्त्री भी थे जिन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप एक स्वदेशी व्यावहारिक एवं मानवीय शिक्षा-दर्शन प्रस्तुत किया। प्रस्तुत शोध पत्र गांधी की शिक्षा-सम्बन्धी अवधारणा — जिसे नई तालीम बुनियादी शिक्षा अथवा वर्धा शिक्षा योजना के नाम से जाना जाता है — का दार्शनिक शैक्षिक एवं सामाजिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधी ने प्रचलित औपनिवेशिक (मैकाले-प्रणीत) शिक्षा-प्रणाली की तीखी आलोचना की जो उनके अनुसार पुस्तकीय अव्यावहारिक विदेशी भाषा-आधारित एवं श्रम-विमुख थी। इसके प्रतिकार में उन्होंने हस्तशिल्प-केंद्रित (craft-centred) स्वावलंबी (self-supporting) मातृभाषा-आधारित एवं चरित्र-निर्माणकारी शिक्षा का प्रस्ताव रखा जिसका लक्ष्य बालक के मस्तिष्क हृदय एवं हाथ (Head Heart and Hand — 3H) का समन्वित विकास था। यह अध्ययन गांधी की शिक्षा के उद्देश्यों पाठ्यक्रम शिक्षण-पद्धति शिक्षक की भूमिका एवं मूल सिद्धांतों का विवेचन करता है तथा इसकी आधुनिक शिक्षा-नीतियों (विशेषकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के व्यावसायिक एवं अनुभवात्मक शिक्षा सम्बन्धी प्रावधानों) के संदर्भ में प्रासंगिकता का मूल्यांकन करता है। द्वितीयक स्रोतों के गुणात्मक-विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर यह पत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि गांधी की शिक्षा-अवधारणा यद्यपि अपने समय में पूर्णतः क्रियान्वित नहीं हो सकी तथापि इसके मूल सिद्धांत — श्रम की प्रतिष्ठा अनुभवजन्य ज्ञान मूल्य-शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता — आज भी शिक्षा-सुधार के लिए अत्यंत प्रासंगिक एवं मार्गदर्शक हैं।