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“पवित्र की पुनः प्राप्ति: हिंदुत्व आख्यान और भारतीय इतिहासलेखन में स्मृतियों का टकराव”
Author(s): Ashok Kumar

Abstract
इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का कालानुक्रमिक विवरण नहीं होता वह स्मृति अस्मिता और सत्ता के निर्माण का उपकरण भी होता है। विशेषकर भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश में इतिहास का लेखन केवल विद्वत्तापूर्ण अभ्यास नहीं बल्कि यह एक वैचारिक और राजनीतिक हस्तक्षेप बन गया है। यह प्रक्रिया और अधिक जटिल तब हो जाती है जब पवित्र अर्थात धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों और स्थलों से जुड़ी स्मृतियाँ—जो किसी समुदाय की आत्म-चेतना का केंद्र होती हैं—इतिहासलेखन की वैचारिक प्रतिस्पर्धा का विषय बन जाएँ। इसी संदर्भ में हिंदुत्व एक ऐसे वैचारिक आख्यान के रूप में उभरता है जो “पवित्र” को केवल धार्मिक नहीं बल्कि सभ्यतामूलक स्मृति और सांस्कृतिक दावे के रूप में प्रस्तुत करता है।