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हिन्दी साहित्य में आदिवासी विमर्श का स्वरूप एवं विकास
Author(s): मनीष कुमार

Abstract
आदिवासी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘आदि’ जिसका अर्थ होता है पहला और ‘वासी’ का अर्थ होता है निवासी अर्थात रहने वाला। इस प्रकार आदिवासी शब्द का शाब्दिक अर्थ हुआ ‘पहले से रहने वाले’ । भारत में इन्हें वनवासी मूलनिवासी या जनजाति भी कहते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार आदिवासी के लिए अनुसूचित-जनजाति शब्द का उपयोग किया गया है। भारत सरकार की अधिकारिक जनगणना के अनुसार आदिवासियों की कुल आबादी भारत की कुल आबादी का केवल 8.6 प्रतिशत है। “भारत के आदिवासियों का इतिहास इस धरती पर कम से कम तीन लाख साल पुराना है। भारत के आदिवासी ही दुनिया के पहले नागरिक पहले गणतंत्र और पहले राष्ट्र हैं।” इसके बावजूद वर्तमान में सबसे उपेक्षित एवं मुख्यधारा से विलग जाति है। उपेक्षित आदिवासियों के जनजीवन भाषा संस्कृति एवं इनसे संबंधित जानकारियों के संरक्षण के लिए एवं सामान्य जनमानस के समक्ष लाने के लिए विमर्श के रूप में बींसवीं सदी में एक साहित्यिक आंदोलन आरंभ किया गया। बींसवीं सदी के अंतिम दशकों से आदिवासी एवं गैर आदिवासी लेखकों/कवियों ने व्यापक रूप से साहित्य-सृजन का कार्य आरंभ किया। इस शोध-आलेख में आगे आदिवासी विमर्श साहित्यिक रूप में हिंदी साहित्य के अलग-अलग विधाओं में किस स्वरूप में परिलक्षित हुआ है उसे रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।