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नारी सशक्तिकरण एवं सामाजिक परिवर्तन पर डॉ. अंबेडकर के विचार
Author(s): डॉ. सुरेन्द्र सिंह

Abstract
वर्तमान युग में दलितों के अधिकार की तमाम बातों के साथ महिला अधिकारों की बात करना स्वाभाविक है फिर महिला किसी भी धर्म या जाति की क्यों ना हो उसे पुरुष की परछाई के रूप में ही देखा जाता है दलित अत्याचार की बात करें तो पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं पर समाज में अत्याचार अधिक देखने को मिलता है आज बदलते परिवेश को देखते हुए देश की उन्नति में आधार कही जाने वाली महिलाओं को जिस बराबरी और समानता के अनुरूप बाबासाहेब अंबेडकर ने देखा उस रूप में किसी अन्य महापुरुष ने नहीं देखा। यूँ तो समय के साथ-साथ कई महापुरुषों ने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया लेकिन भारत के मूल दस्तावेज़ों में इन अधिकारों को दर्ज कराने का काम बाबासाहेब अंबेडकर ने किया वह भी कड़े विरोध के बावजूद। इस पर विरोध उन लोगों की संकुचित मानसिकता को दर्शाता है। जिन्होंने हमेशा महिलाओं को दोयम दर्जे का स्थान दिया है। जिनके लिए महिला उनकी सम्पत्ति से अधिक कुछ नहीं। आज भी जब पूरा देश महिला सुरक्षा और ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे सशक्त संदेशों को दूर-दूर तक पहुंचाने के दावे करता है ऐसे में इस बात को जानना और भी जरूरी हो जाता है कि जो अधिकार बाबासाहेब आंबेडकर ने महिलाओं को दिए उन अधिकारों को वह कितना जानते हैं।