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दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में मानववाद के दार्शननक निद्ाांत ांका अध्ययन
Author(s): डॉ मुकेश शुक्ला

Abstract
दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपातदि एकात्म मानववाद भारिीय त िंिन सिंस्कृ ति और समाज की प्रकृ ति के अनुरूप तवकतसि एक सवाांगीण दार्शतनक दृति है जो मनुष्य को न के वल एक जैतवक या आतथशक इकाई के रूप में देखिा है बल्कि उसे आध्याल्कत्मक नैतिक सामातजक पाररवाररक और सािंस्कृ तिक सिंबिंधोिं के समुच्चय के रूप में पररभातिि करिा है। इसके तवपरीि पतिमी मानववाद का उद्भव यूरोप के पुनजाशगरण ज्ञानोदय और औद्योतगक क्ािंति के वै ाररक पररविशन में हुआ तजसमें मनुष्य को मुख्यिः िकश व्यल्किगि स्वििंत्रिा स्वायत्तिा और भौतिक उन्नति का कें द्र माना गया। दोनोिं मानववादोिं के बी यह अिंिर न के वल उनके दार्शतनक आधार में तमलिा है बल्कि उनकी सामातजक आतथशक और नैतिक व्याख्याओिं में भी स्पि रूप से तदखाई देिा है। एकात्म मानववाद ‘समन्वयवाद’ ‘कु टुिंब-भावना’ ‘धमश’ को किशव्य के रूप में और ‘ िुतवशध पुरुिाथश’ को जीवन के सिंिुलन का आधार मानिा है जबतक पतिमी मानववाद में व्यल्कि-स्वाििंत्र्य वैज्ञातनक िकश अनुबिंधवादी नैतिकिा और आतथशक व्यल्किवाद प्रमुख हैं। इस र्ोध-पत्र में दोनोिं मानववादोिं के उद्भव उनके मूलभूि तसद्ािंिोिं समाज-दर्शन अथश-दृति और नैतिक सरोकारोिं का तवस्तृि िुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुि तकया गया है। अध्ययन से स्पि होिा है तक एकात्म मानववाद एक समग्र सिंिुतलि और सािंस्कृ तिक रूप से जुडी मानव-के ल्किि दृति प्रस्तुि करिा है