समकालीन भारतीय समाज में समग्र ज्ञान की अवधारणा और प्रासंगिकता
Author(s): Dr. Neha SharmaAbstract
समकालीन भारतीय समाज तीव्र सामाजजक आजथिक साांस्कृ जतक और वैचाररक पररवतिन ां के दौर से गुजर रहा है। इस पररवतिनशील पररदृश्य में ज्ञान की भूजमका अत्यांत महत्वपूर्ि ह गई है जकां तु ज्ञान का स्वरूप प्रायः खांजित जवषय- जवशेष तक सीजमत और उपय जगतावादी ह ता जा रहा है। ऐसे में समग्र ज्ञान की अवधारर्ा एक सशक्त वैचाररक जवकल्प के रूप में उभरती है ज ज्ञान क के वल सूचना या कौशल के रूप में नहीां बल्कि जीवन समाज और मूल् ां से जुडे व्यापक ब ध के रूप में देखती है। भारतीय परां परा में ज्ञान क सदैव समग्र दृजि से समझा गया है जहााँ भौजतक नैजतक आध्याल्किक और सामाजजक पक्ष एक-दूसरे से अलग नही ांमाने गए। यह श ध-पत्र समकालीन भारतीय समाज में समग्र ज्ञान की अवधारर्ा उसकी दाशिजनक पृष्ठभूजम और उसकी वतिमान प्रासांजगकता का गहन जवश्लेषर् प्रस्तुत करता है। सार रूप में यह अध्ययन यह प्रजतपाजदत करता है जक आज के समय में सामाजजक जवघटन मूल् सांकट और पहचान के प्रश् ां के समाधान हेतु समग्र ज्ञान की पुनर्सथािपना अत्यांत आवश्यक है।