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सामाजिक जिकास में भूजमका
Author(s): Dr. Pradeep Kumar

Abstract
समकालीन समाज ननरंतर पररवततन जनिलता और नवनवधताओं से युक्त एक ऐसी संरचना है नजसमें सामानजक नवकास की प्रनिया बहुआयामी और गहन स्वरूप धारण कर चुकी है। सामानजक नवकास के वल आनथतक उन्ननत या भौनतक प्रगनत तक सीनमत नही ं है बल्कि इसमें सामानजक न्माय सांस्कृ नतक समन्वय नैनतक मूल्यं निक्षा स्वास्थ्य पयातवरण और मानवीय चेतना जैसे अनेक पक्ष सल्किनलत हयते हैं। इस व्यापक सामानजक पररदृश्य में समग्र ज्ञान की भूनमका अत्यंत महत्वपूणत हय जाती है। समग्र ज्ञान वह दृनि है जय ज्ञान कय खंनित रूप में न देखकर उसके नवनभन्न पक्षय ं कय परस्पर संबद्ध मानते हुए समाज की संपूणतता कय समझने का प्रयास करती है। यह ियध-पत्र सामानजक नवकास की प्रनिया में समग्र ज्ञान की भूनमका का गहन नवश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह स्पि करता है नक नबना समग्र ज्ञान के सामानजक नवकास की अवधारणा अधूरी और असंतुनलत रह जाती है। अध्ययन यह दिातता है नक समग्र ज्ञान सामानजक समस्याओ ं की जडय ं तक पहुुँचने उनके अंतसंबंधय ं कय समझने और उनके नलए दीर्तकानलक तथा मानवीय समाधान नवकनसत करने में सहायक हयता है। इस प्रकार यह ियध सामानजक नवकास कय के वल एक लक्ष्य न मानकर एक सतत मूल्परक और समल्कन्वत प्रनिया के रूप में स्थानपत करता है।