डिजिटल युग में सामाजिक निगरानी और नागरिक स्वतंत्रता का संकट
Author(s): Prof. Ritu BirlaAbstract
डिजिटल युग ने मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र—राजनीति प्रशासन अर्थव्यवस्था शिक्षा संचार तथा सामाजिक संबंधों—को गहराई से प्रभावित किया है परंतु इसके साथ ही एक ऐसा नया शक्ति-संतुलन उभरा है जिसमें सूचना डेटा और निगरानी प्रमुख साधन बन गए हैं। आज राज्य कॉरपोरेट संस्थाएँ और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नागरिकों की गतिविधियों संवाद उपभोग व्यवहार स्थान जैविक पहचान तथा वैचारिक रुझानों तक का निरंतर संकलन और विश्लेषण कर रहे हैं जिससे एक व्यापक “डिजिटल निगरानी संरचना” निर्मित हो रही है। यह निगरानी केवल सुरक्षा या प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं है बल्कि यह सामाजिक नियंत्रण वैचारिक निर्माण उपभोक्ता व्यवहार के प्रबंधन तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण तक विस्तृत हो चुकी है। परिणामस्वरूप नागरिक स्वतंत्रता—विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निजता का अधिकार संगठन की स्वतंत्रता तथा असहमति का अधिकार—नए प्रकार के दबावों और अदृश्य नियंत्रणों के अधीन आ गई है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म एल्गोरिदमिक निगरानी के माध्यम से न केवल व्यक्तियों की प्रोफाइलिंग करते हैं बल्कि उनके व्यवहार को पूर्वानुमानित और प्रभावित भी करते हैं जिससे स्वतंत्र इच्छा और स्वायत्त निर्णय की अवधारणा चुनौतीग्रस्त होती है। राज्य द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा आतंकवाद-रोधी उपायों या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर किए जा रहे निगरानी उपाय भी नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन के प्रश्न को जटिल बना देते हैं। इस शोध का उद्देश्य डिजिटल निगरानी की प्रकृति उसके उपकरणों उसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों तथा नागरिक स्वतंत्रता पर उसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करना है। यह अध्ययन यह समझने का प्रयास करता है कि क्या डिजिटल तकनीक लोकतंत्र को सशक्त बना रही है या एक “निगरानी लोकतंत्र” की ओर ले जा रही है जहाँ पारदर्शिता नागरिकों के लिए नहीं बल्कि नागरिकों पर लागू होती है। साथ ही यह शोध निजता डेटा-सुरक्षा कानून नैतिक प्रशासन तथा डिजिटल अधिकारों के संदर्भ में नीतिगत सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।