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भारत में बेरोजगारी और उसके सामाजिक प्रभाव
Author(s): Prof. Nandita Narain

Abstract
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में बेरोजगारी एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या के रूप में उभरकर सामने आई है। आर्थिक विकास औद्योगिक विस्तार और तकनीकी प्रगति के बावजूद रोजगार के अवसरों की उपलब्धता जनसंख्या वृद्धि की गति के अनुरूप नहीं बढ़ पाई है। परिणामस्वरूप बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या तक सीमित नहीं रह गई बल्कि यह सामाजिक संरचना पारिवारिक संबंधों मानसिक स्वास्थ्य तथा सामाजिक स्थिरता को भी गहराई से प्रभावित कर रही है। विशेष रूप से युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी समाज में असंतोष निराशा और असुरक्षा की भावना को जन्म देती है जिससे सामाजिक असमानता और वर्गीय विभाजन भी बढ़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता सीमित औद्योगिक विकास तथा शिक्षा और कौशल के बीच असंतुलन बेरोजगारी को और अधिक जटिल बना देते हैं। दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा अस्थायी रोजगार तथा तकनीकी परिवर्तन भी बेरोजगारी के नए आयाम प्रस्तुत करते हैं। बेरोजगारी के सामाजिक प्रभावों में गरीबी अपराध सामाजिक तनाव पारिवारिक विघटन और मानसिक अवसाद जैसी समस्याएँ प्रमुख रूप से सामने आती हैं। यह शोधपत्र भारत में बेरोजगारी की प्रकृति उसके कारणों तथा समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों का विश्लेषण करता है। इसके साथ ही यह अध्ययन इस बात को समझने का प्रयास करता है कि बेरोजगारी किस प्रकार सामाजिक संरचना युवा वर्ग की आकांक्षाओं तथा सामाजिक विकास की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।