मध्यकालीन भारत में स्त्री की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका : एक सकारात्मक ऐतिहासिक अध्ययन
Author(s): PoonamAbstract
मध्यकालीन भारत का इतिहास सामान्यतः राजनीतिक संघर्षों धार्मिक परिवर्तनों और सत्ता संरचनाओं के अध्ययन तक सीमित रहा है जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पक्ष अपेक्षाकृत उपेक्षित रह गए। विशेष रूप से स्त्री की स्थिति को लेकर प्रचलित ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रायः एकांगी और नकारात्मक रहा है जिसमें मध्यकालीन स्त्री को सामाजिक बंधनों असमानताओं और सीमित स्वतंत्रता के संदर्भ में ही देखा गया। प्रस्तुत शोध-पत्र इस रूढ़ दृष्टिकोण से हटकर मध्यकालीन भारत में स्त्री की सामाजिक एवं सांस्कृतिक भूमिका का एक सकारात्मक संतुलित और संदर्भ-संवेदनशील ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि मध्यकालीन भारतीय समाज में स्त्री केवल घरेलू या गौण भूमिका तक सीमित नहीं थी बल्कि वह सामाजिक संरचना की एक सक्रिय सृजनशील और प्रभावशाली इकाई थी। परिवार समाज धर्म संस्कृति लोकजीवन कला और साहित्य जैसे क्षेत्रों में स्त्री की उपस्थिति न केवल स्थायी थी बल्कि अनेक स्तरों पर निर्णायक भी रही। इस काल में स्त्री ने सामाजिक मूल्यों के संरक्षण सांस्कृतिक परंपराओं के संवहन और मानवीय संवेदनाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह शोध यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि मध्यकालीन भारत में स्त्री की स्थिति को समझने के लिए उसे केवल आधुनिक मानकों या वर्तमान सामाजिक मूल्यों के आधार पर नहीं आँका जा सकता। तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि स्त्री को सम्मान गरिमा और सामाजिक स्वीकृति प्राप्त थी तथा उसने अपनी भूमिका के माध्यम से समाज की निरंतरता और सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ किया। इस प्रकार यह शोध-पत्र मध्यकालीन स्त्री को पीड़िता के रूप में नहीं बल्कि इतिहास की एक सकारात्मक सशक्त और रचनात्मक सहभागी के रूप में प्रस्तुत करता है।