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भक्ति परंपरा की लोक कथाओं में स्त्री स्वायत्तता और पितृसत्तात्मक प्रतिरोध: एक आलोचनात्मक अध्ययन
Author(s): Reena Research Scholar Dr. Amit Chamoli Professor

Abstract
भक्ति परंपरा भारतीय सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण धारा है जिसने न केवल धार्मिक चेतना को जनसामान्य तक पहुँचाया बल्कि सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त असमानताओं को भी चुनौती दी। इस परंपरा में विकसित लोक कथाएँ समाज की सामूहिक चेतना का दर्पण प्रस्तुत करती हैं जिनमें स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुआयामी रूप में सामने आती है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य भक्ति परंपरा की लोक कथाओं में स्त्री स्वायत्तता और पितृसत्तात्मक प्रतिरोध के स्वरूप का आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। इन लोक कथाओं में स्त्री केवल एक पारंपरिक या सहायक पात्र नहीं है बल्कि वह एक स्वतंत्र चेतनशील और संघर्षशील व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आती है जो सामाजिक बंधनों और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के विरुद्ध प्रतिरोध करती है। यह अध्ययन यह दर्शाने का प्रयास करता है कि भक्ति परंपरा ने स्त्री को आत्म-अभिव्यक्ति का एक ऐसा मंच प्रदान किया जिसके माध्यम से उसने अपने अस्तित्व को पुनर्परिभाषित किया और सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी (शर्मा 2022)। इस शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भक्ति परंपरा की लोक कथाओं में स्त्री की स्वायत्तता केवल आध्यात्मिक स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि यह सामाजिक सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक स्तरों पर भी अभिव्यक्त होती है। मीरा अक्का महादेवी और ललद्यद जैसी संत-स्त्रियाँ इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं कि स्त्री ने भक्ति को एक साधन के रूप में प्रयोग करते हुए पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध किया और अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित की। यह अध्ययन आधुनिक नारी विमर्श के संदर्भ में भी अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि यह यह स्पष्ट करता है कि स्त्री का संघर्ष कोई नवीन घटना नहीं है बल्कि यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा है जो विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्त होती रही है। इस प्रकार यह शोध अतीत और वर्तमान के बीच एक सशक्त संवाद स्थापित करता है और नारी विमर्श को एक व्यापक ऐतिहासिक आधार प्रदान करता है (वर्मा 2023)।