जलवायु परिवर्तन और सामाजिक रूपांतरण: भारत में विस्थापन अनुकूलन और सामुदायिक प्रत्यास्थता के उभरते आयाम
Author(s): Dr. MadhuriAbstract
जलवायु परिवर्तन भारत में केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया बनता जा रहा है। बाढ़ सूखा चक्रवात समुद्र-स्तर वृद्धि अत्यधिक गर्मी भूस्खलन और जल-संकट जैसी घटनाएँ आजीविका आवास स्वास्थ्य खाद्य सुरक्षा और सामाजिक संबंधों को प्रभावित कर रही हैं तथा अनेक समुदायों में अस्थायी और स्थायी गतिशीलता को बढ़ावा दे रही हैं। यह अध्ययन भारत में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न विस्थापन अनुकूलन और सामुदायिक प्रत्यास्थता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों सरकारी नीतियों अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और उपलब्ध अकादमिक साहित्य पर आधारित है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जलवायु-प्रेरित प्रवासन केवल पर्यावरणीय दबाव का परिणाम नहीं बल्कि गरीबी असमानता आजीविका की निर्भरता संसाधनों की उपलब्धता और संस्थागत क्षमता से प्रभावित प्रक्रिया है। समुदाय स्थानीय ज्ञान सामाजिक नेटवर्क आजीविका विविधीकरण और सामूहिक सहयोग के माध्यम से अनुकूलन करते हैं लेकिन कमजोर समूहों की क्षमता सीमित रहती है। अतः न्यायपूर्ण जलवायु नीति में सुरक्षित गतिशीलता स्थानीय अनुकूलन सामाजिक संरक्षण और समुदाय-आधारित प्रत्यास्थता को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है।